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शनिवार, फ़रवरी 10, 2018

मौन...पहाड़ का


नग्न काया
परवत की
बज रहा
संगीत 
पतझड़ का
कुछ विरहगान
गुनगुनाती
पहाड़ी लड़कियाँ
गीत में...है 
समाया हुआ
दुःख पहाड़ का
सिकुड़कर 
लाज से
सिसकते सिकुड़ी सी 
नदी
जंगल तोड़ रहे
मौन...पहाड़ का
और नदी के
छल-छलाने की
आवाज भी
भंग करती है मौन 

4 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक १२ फरवरी २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  2. वाह !!! बड़ा ही प्रखर है पहाड़ों का ये मौन | वैभवी जी -सस्नेह शुभकामना |

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